स्रोतदुष्टि (Srotodushti): निदान(कारण), लक्षण और खावैगुण्य से अंतर
आयुर्वेद में रोगों के निदान और चिकित्सा को समझने के लिए स्रोतोदुष्टि (Srotodushti) का अध्ययन अत्यंत महत्वपूर्ण है। शरीर के विभिन्न घटकों और धातुओं के वहन के लिए स्रोतस मुख्य माध्यम होते हैं। जब ये स्रोतस दूषित होते हैं, तो शरीर में अनेक प्रकार के विकार उत्पन्न होने लगते हैं।
स्रोतोदुष्टि के सामान्य हेतु (Causes of Srotodushti)
चरक संहिता (विमान स्थान 5/23) के अनुसार:
* आहारश्च विहारश्च यः स्याद्दोषगुणैः समः। धातुभिर्विगुणश्चापि स्रोतसां स प्रदूषकः॥
* अर्थ: जो अहार-विहार निदान से शारीरिक दोष (वात, पित्त, कफ) के समान गुण को बढाने वाला हो। और जो आहार-विहार निदान से सप्त धातुओं के विपरीत गुण से वे सभी स्रोतसों को दूषित कर देते है।
उदाहरण: दिवास्वप्न (दिन में सोना), अत्यधिक भोजन करना, या मेदस्वी प्राणियों के मांस व वसा के समान गुणों वाले आहार का सेवन करना मेद धातु और उससे संबंधित स्रोतसों को दूषित करता है।
धातुभि विगुण का अर्थ:
* आहार के संदर्भ में "धातुभि विगुण" का तात्पर्य यह है कि आहार या अन्य कारक धातुओं के साथ विरोधात्मक स्वभाव रखते हैं। भले ही वे गुणों में समान दिखें (जैसे अत्यधिक वसा का सेवन और शरीर का मेद), फिर भी वे धातुओं की साम्यावस्था को बिगाड़कर उन्हें दूषित कर देते हैं।
* स्रोतसों के दूषित होने पर उनमें रहने वाली धातु भी दूषित हो जाती है
* तानि दुष्टानि रोगाय, विशुद्धानि सुखाय च - आं० ह्र० शा०- 3/42
अहित आहार बिहार के सेवन से स्रोत दूषित होकर रोग उत्पन्न करते है। और हितकर आहार- विहार के सेवन से स्रोत शुद्ध होकर आरोग्य के कारण होते है।
स्रोतोदुष्टि के सामान्य लक्षण (Symptoms of Srotodushti)
चरक संहिता (विमान स्थान 5/24) में स्रोतोदुष्टि के मुख्य 4 लक्षण बताए गए हैं:
* अतिप्रवृत्तिः संगो वा सिराणां ग्रन्थयोऽपि वा। विमार्गगमनं चापि स्रोतसां दुष्टिलक्षणम्॥
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* अतिप्रवृत्ति (Excessive Output / Flow)
* संग (Obstruction / Blockage)
* सिरा ग्रन्थि (Dilation / Nodules in Vessels)
* विमार्ग गमन (Extravasation / Diverted Flow)
स्रोतोदुष्टि के लक्षणों का विस्तृत वर्णन
1. अतिप्रवृत्ति (Atipravritti)
* परिभाषा: दोषों, धातुओं या मलों का सामान्य से अधिक मात्रा या वेग में बाहर निकलना अतिप्रवृत्ति कहलाता है।
* उदाहरण:
* प्रमेह रोग: मूत्रवह स्रोतस की दुष्टि के कारण अत्यधिक मात्रा में मूत्र प्रवृत्ति होना।
* अतिसार रोग: पुरीषवह स्रोतस की दुष्टि के कारण बार-बार पतला मल आना।
* प्रतिश्याय रोग: नासा मार्ग से दुष्ट श्लेष्मा (कफ) का अत्यधिक बहना।
2. संग (Sanga)
* परिभाषा: स्रोतसों के मार्ग में अवरोध (Blockage) होना, जिससे धातुओं या मलों की प्रवृत्ति रुक जाती है या बहुत कम मात्रा में होती है।
* उदाहरण:
* उदावर्त: अपान वायु के रुकने से मल का मलमार्ग में ही अवरुद्ध हो जाना।
* मूत्रकृच्छ्र: रुक-रुक कर और कष्ट के साथ अल्प मात्रा में मूत्र होना।
* ज्वर: अग्निदुष्टि से उत्पन्न आम दोष का स्वेदवह स्रोतस में अवरोध पैदा करना।
3. सिराग्रन्थि (Sira Granthi)
* परिभाषा: सिराओं में गांठ (Nodule) या कुटिलता (Thrombosis/Varicose condition) उत्पन्न होना। आचार्य अरुणदत्त ने इसे 'सिरा कुटिल भाव' की संज्ञा दी है।
* उदाहरण:
* सिराग्रन्थि(Varicose vein), श्लीपद (Filariasis /elephantiasis)
4. विमार्गगमन (Vimarga Gamana)
* परिभाषा: शरीर के तत्वों या मलों का अपने स्वाभाविक मार्ग को छोड़कर किसी अन्य मार्ग से बाहर निकलना।
* उदाहरण: * मल का मूत्रमार्ग से आना।
* उर्ध्वरक्तपित्त: रक्त का अपने स्वाभाविक मार्ग के बजाय मुख, नाक, नेत्र या कान से बाहर निकलना।
* अधोगरक्तपित्त: रक्त का गुदा या मूत्रमार्ग से बाहर निकलना।
स्रोतोदुष्टि और खावैगुण्य में अंतर (Difference Between Srotodushti and Khavaigunya)
रोग की सम्प्राप्ति (Pathogenesis) को सही ढंग से समझने के लिए स्रोतोदुष्टि और स्रोतोवैगुण्य का अंतर जानना आवश्यक है:
निष्कर्ष (Conclusion)
आयुर्वेदिक चिकित्सा में सम्प्राप्ति विघटन के लिए यह पहचानना जरूरी है कि स्रोतस में अतिप्रवृत्ति, संग, सिराग्रन्थि या विमार्गगमन में से किस प्रकार की दुष्टि हुई है। स्रोतोवैगुण्य प्रारंभिक अवस्था है, जबकि स्रोतोदुष्टि स्थापित रोग का प्रतीक है। सही निदान से ही सटीक और प्रभावकारी चिकित्सा संभव है।
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